आत्मा एवं शरीर का अद्भुत विश्लेषण

श्रीमद् भागवत गीता में आत्मा एवं शरीर से जुड़े हुए प्रत्येक पहलू पर अद्भुत तरीके से बतलाया गया है। श्रीमद भगवत गीता के पहले अध्याय में अर्जुन मोह ग्रसित हो जाता है, तमाम प्रकार की शंका कुशंका उसे घेर लेती है। उसके बाद भगवान श्री कृष्ण दूसरे अध्याय की शुरुआत में अर्जुन को पहला ज्ञान इसी बात का देते हैं कि आत्मा और शरीर क्या है?.

शरीर और आत्मा के बीच के संबंध क्या संबंध है

श्रीमद्भागवत गीता का दूसरा अध्याय में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि

“अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥”

अर्थात जो पूरे शरीर में व्याप्त है, उसे ही तुम अविनाशी समझो। उस अनश्वर आत्मा को नष्ट करने मे कोई भी समर्थ नहीं है। इस श्लोक में आत्मा एवं शरीर के बारे में विश्लेषण (Shrimad Bhagwat Geeta se jane Aatma & sharir ka adbhut vishleshan) किया गया है।

आत्मा शरीर में व्याप्त है, यह कहकर श्रीकृष्ण शरीर और आत्मा के बीच के संबंध का निरूपण कर रहे हैं। इससे उनका तात्पर्य क्या है? आत्मा चेतन है अर्थात चैतन्य स्वरूप है। शरीर जड़ पदार्थों से निर्मित और चेतना रहित होता है। जबकि आत्मा अपनी चेतन शक्ति को शरीर में संचारित करने के साथ पूरे शरीर में वास करती है। इस प्रकार आत्मा शरीर में व्याप्त रहकर पूरे शरीर को सचेतन बनाती है।

शरीर में आत्मा कहां रहती है?

कुछ लोग शरीर में आत्मा के निवास स्थान के संबंध में प्रश्न करते हैं। वेदों में वर्णन किया गया है कि आत्मा हृदय में वास करती है। प्रश्नोपनिषद में आया है कि “हृदि ह्येष आत्मा । (प्रश्नोपनिषद्-3.6)” वही छांदोग्य उपनिषद में बतलाया गया है कि “स वा एष आत्मा हृदि। (छान्दोग्योपनिषद-8.3.3)” अर्थात “हृदि शब्द दर्शाता है कि आत्मा हृदय के आस-पास स्थित होती है। जबकि चेतना जो कि आत्मा का लक्षण है, पूरे शरीर में प्रसारित रहती है।” ऐसा कैसे संभव है?

महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्म सूत्र में इस दृष्टिकोण को निम्न प्रकार से समझाया है कि अविरोधश्चन्दनवत् ।। (ब्रह्मसूत्र-2.3.24) मतलब “जिस प्रकार मस्तक पर चंदन का लेप करने से पूरा शरीर शीतल हो जाता है उसी प्रकार यद्यपि आत्मा हृदय के भीतर स्थित रहती है तदपि पूरे शरीर में अपनी चेतन शक्ति को प्रसारित करती रहती है।” कुछ लोग पुनः यह प्रश्न करते हैं कि यदि चेतना आत्मा का अभिलक्षण है तब वह पूरे शरीर में कैसे प्रसारित होती है।इस प्रश्न का उत्तर भी महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्म सूत्र में ही दिया है कि व्यतिरेको गन्धवत्। (ब्रह्मसूत्र-2.3.27) अर्थात “सुगंध, पुष्प का गुण है। जिस उद्यान में पुष्प खिलते हैं वह उद्यान भी फूलों की सुगंध से सुगंधित हो जाता है।” इसका अर्थ है कि जिस प्रकार पुष्प की सुगंध पूरे उद्यान को सुगंधित करने में सक्षम होती है उसी प्रकार से आत्मा चेतन है और यह जड़ शरीर में चेतना भरकर उसे सचेतन बना देती है।

शरीर में आत्मा निवास करती है, शरीर की नाशवान है

श्रीमद भगवत गीता का दूसरा अध्याय में ही आया है कि “अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥” अर्थात केवल भौतिक शरीर ही नश्वर है और शरीर में व्याप्त आत्मा अविनाशी, अपरिमेय तथा शाश्वत है। इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है “वास्तव में शरीर मिट्टी से बना है। यह मिट्टी साग-सब्जियों, फलों, अनाज, दाल और घास में परिवर्तित होती है। गायें घास चरती हैं और दूध देती हैं। हम मनुष्य इन खाद्य पदार्थो का सेवन करते हैं और ये हमारे शरीर में प्रवेश करते हैं। अतः यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि शरीर मिट्टी से निर्मित है। इसके अतिरिक्त मृत्यु के समय जब आत्मा शरीर को छोड़ देती है तब शरीर की अंत्येष्टि तीन प्रकार से की जाती है-कृमि, विद् या भस्म।

यदि शरीर को अग्नि में जलाया जाता है तब यह राख में परिवर्तित हो जाता है, यदि दफनाया जाता है तो यह कीटाणुओं का भोजन बनता है और अंततः मिट्टी में मिल जाता है और यदि इसे जल मे प्रवाहित कर दिया जाता है तो यह समुद्री जीवों का ग्रास बनता है और अंततः समुद्र के तल की मिट्टी में मिल जाता है। यही मिट्टी खाद्य पदार्थों में परिवर्तित होती है और इन्हीं खाद्य पदार्थों से हमारा शरीर बनता है और अंततः मृत्यु के पश्चात शरीर मिट्टी में परिवर्तित होकर उसी में मिल जाता है। श्रीकृष्ण अर्जुन को अवगत कराते हैं कि इस भौतिक शरीर में नित्य अविनाशी सत्ता अर्थात आत्मा वास करती है जो कि मिट्टी से निर्मित नहीं है। आत्मा दिव्य और सनातन है।”

आत्मा जन्म एवं मृत्यु से परे है

न जायते म्रियते वा कदाचिनायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥

अर्थात आत्मा का न तो कभी जन्म होता है न ही मृत्यु होती है और न ही आत्मा किसी काल में जन्म लेती है और न ही कभी मृत्यु को प्राप्त होती है। आत्मा अजन्मा, शाश्वत, अविनाशी और चिरनूतन है। शरीर का विनाश होने पर भी इसका विनाश नहीं होता। इस श्लोक में आत्मा की शाश्वतता को सिद्ध किया गया है जो सनातन है तथा जन्म और मृत्यु से परे है। परिणामस्वरूप आत्मा के स्वरूप को छः श्रेणियों में विभक्त किया गया है-“अस्ति, जायते, वर्धते, विपरिणामते, अपक्षीयते और विनिश्यति” अर्थात गर्भावस्था में आना, जन्म, विकास, प्रजनन, हास और मृत्यु। ये सब शरीर के बदलते स्वरूप हैं न कि आत्मा के। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, वह केवल शरीर का विनाश है किन्तु शाश्वत आत्मा शरीर के सभी परिवर्तनों से अछूती रहती है अर्थात शरीर में समय-समय पर होने वाले परिवर्तनों का आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वेदों में इस दृष्टिकोण को बार-बार दोहराया गया है।

कठोपनिषद् में निहित मंत्र भी लगभग गीता के उपर्युक्त श्लोक के समान उपदेश देते हैं। कठोपनिषद के मंत्र में भी कहा गया है कि “न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।। (कठोपनिषद्-1.2.18) “आत्मा का न तो जन्म होता है और न ही यह मरती है, न ही किसी से यह प्रकट होती है, न ही इससे कोई प्रकट होता है। यह अजन्मा अविनाशी और चिरनूतन है। शरीर का विनाश हो जाने पर भी यह अविनाशी है।”

बृहदारण्यकोपनिषद् में भी वर्णन किया गया है “स वा एष महानज आत्माजरोऽमरोऽमृतोऽभयो” (बृहदारण्यकोपनिषद्-4.4.25) अर्थात “आत्मा आनन्दमय, अजन्मा अविनाशी, वृद्धावस्था से मुक्त, अमर और भय मुक्त है”।

आत्मा एवं शरीर का विश्लेषण

श्रीमद्भागवत गीता के दूसरे अध्याय भगवान में श्री कृष्ण कहते हैं कि देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्षीरस्तत्र न मुह्यति॥

अर्थात- जैसे देहधारी आत्मा इस शरीर में बाल्यावस्था से तरुणावस्था और वृद्धावस्था की ओर निरन्तर अग्रसर होती है, वैसे ही मृत्यु के समय आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है। बुद्धिमान मनुष्य ऐसे परिवर्तन से मोहित नहीं होते।

श्रीकृष्ण सटीक तर्क के साथ आत्मा के एक जन्म से दूसरे जन्म में देहान्तरण के सिद्धान्त को सिद्ध करते हैं। वे यह समझा रहे हैं कि किसी भी मनुष्य के जीवन में उसका शरीर बाल्यावस्था से युवावस्था, प्रौढ़ता और बाद में वृद्धावस्था में परिवर्तित होता रहता है। आधुनिक विज्ञान से भी यह जानकारी मिलती है कि हमारी शरीर की कोशिकाएँ पुनरूज्जीवित होती रहती हैं। पुरानी कोशिकाएँ जब नष्ट हो जाती हैं तो नयी कोशिकाएँ उनका स्थान ले लेती हैं।

एक अनुमान के अनुसार सात वर्षों में हमारे शरीर की सभी कोशिकाएँ प्राकृतिक रूप से परिवर्तित होती हैं। इसके अतिरिक्त कोशिकाओं के भीतर के अणु और अधिक शीघ्रता से परिवर्तित होते हैं। हमारे द्वारा ली जाने वाली प्रत्येक श्वास के साथ ऑक्सीजन के अणु उपापचय प्रक्रिया द्वारा हमारी कोशिकाओं में मिल जाते हैं और वे अणु जो अब तक हमारी कोशिकाओं के भीतर फंसे थे, वे कार्बन डाईआक्साइड के रूप में बाहर निकल जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार एक वर्ष के दौरान हमारे शरीर के लगभग 98 प्रतिशत अणु परिवर्तित होते हैं और फिर भी शरीर के क्रमिक विकास के पश्चात हम स्वयं को वही व्यक्ति समझते हैं। क्योंकि हम भौतिक शरीर नहीं हैं अपितु इसमें दिव्य आत्मा निवास करती है।

इस श्लोक में देहे का अर्थ ‘शरीर’ और देहि का अर्थ ‘शरीर का स्वामी’ या आत्मा है। श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करते हुए अवगत कराते हैं कि शरीर में केवल एक ही जीवन तक क्रमिक परिर्वतन होता रहता है जबकि आत्मा कई शरीरों में प्रवेश करती रहती है। समान रूप से मृत्यु के समय यह दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। वास्तव में जिसे हम लौकिक शब्दों में मृत्यु कहते हैं, वह केवल आत्मा का अपने पुराने दुष्क्रियाशील शरीर से अलग होना है और जिसे हम ‘जन्म’ कहते हैं, वह आत्मा का कहीं पर भी किसी नये शरीर में प्रविष्ट होना है। यही पुनर्जन्म का सिद्धान्त है। आधुनिक युग के अधिकतर दर्शन भी पुनर्जन्म की धारणा को स्वीकार करते हैं। यह हिन्दू, जैन, और सिख धर्म का अभिन्न अंग है। बौद्ध ध म में महात्मा बुद्ध ने अपने पूर्वजन्मों की बार-बार चर्चा की है। अधिकतर लोग नहीं जानते है कि पुनर्जन्म पाश्चात्य दर्शन की आस्था पद्धति का भी बृहत अंश था।.

आत्मा नए शरीर को किस प्रकार धारण करती है

” वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्वाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥”

अर्थात जिस प्रकार से मनुष्य अपने फटे पुराने वस्त्रों को त्याग कर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार मृत्यु होने पर आत्मा पुराने तथा व्यर्थ शरीर को त्याग कर नया शरीर धारण करती है। आत्मा की प्रकृति का निरन्तर निरूपण करते हुए भगवान श्रीकृष्ण पुनर्जन्म की अवधारणा को दोहराते हुए उसकी तुलना दैनिक क्रिया-कलापों से कर रहे हैं। जब वस्त्र फट जाते हैं या व्यर्थ हो जाते हैं तब हम उन्हें त्याग कर नये वस्त्र धारण करते हैं और ऐसा करते समय हम स्वयं को नहीं बदलते। इसी प्रकार समान दृष्टि से जब आत्मा जीर्ण शरीर को छोड़ती है तब उसमें किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं होता।

न्याय शास्त्र में इस तर्क को इस प्रकार सिद्ध किया

न्यायशास्त्र में प्रदत्त निम्न तर्क द्वारा पुनर्जन्म की अवधारणा सिद्ध की गयी है। न्याय शास्त्र में कहा गया है कि “जातस्य हर्षभयशोक सम्प्रतिपत्तेः।।” (न्यायशास्त्र-3.1.18) उपर्युक्त तर्क के अनुसार यदि हम छोटे शिशु की गतिविधियों पर ध्यानपूर्वक विचार करते हैं, तब हमें यह ज्ञात होता है कि वह बिना किसी स्पष्ट कारण के कभी प्रसन्न, कभी उदास और कभी भयभीत दिखाई देता है।

न्यायशास्त्र के अनुसार छोटा शिशु अपने पूर्वजन्म का स्मरण करता रहता है और इसी कारण समय-समय पर उसकी मनोदशा में परिवर्तन देखने को मिलता है। हालांकि जैसे-जैसे उसकी आयु बढ़ती है तब उसके मन-मस्तिष्क मे वर्तमान जीवन के संस्कार पूरी तरह अंकित हो जाते हैं तथा जिसके परिणामस्वरूप उसके पूर्वजन्म की स्मृतियाँ विलुप्त हो जाती हैं।

इसके अतिरिक्त जन्म और मृत्यु की प्रक्रिया भी अत्यंत पीड़ादायक होती है जो हमारी पूर्वजन्म की स्मृतियों के ठोस अंशों को मिटा देती है। पुनर्जन्म के पक्ष में न्यायशास्त्र का दूसरा तर्क जिसमें यह कहा गया है-“स्तन्याभिलाषात्” (3.1.21)। इसमें यह वर्णन किया गया है कि नवजात शिशु को भाषा का कोई ज्ञान नहीं होता। तब फिर कोई माँ जब अपने बालक के मुँह में अपना स्तन डाल कर उसे दूध पीना या स्तनपान करना कैसे सिखा सकती है।

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि नवजात शिशु ने अपने अनन्त पूर्व जन्मों में यहाँ तक कि पशु की योनी में स्तन, निप्पल और थन से अपनी असंख्य माताओं का दूध पिया होता है। इसलिए जब माँ अपने बच्चे के मुँह में स्तन का अग्रभाग डालती है, तब बच्चा स्वतः अपने पूर्व जन्म के अभ्यास के आधार पर अपनी माँ का स्तनपान करना आरंभ कर देता है। पुनर्जन्म की अवधारणा को स्वीकार किए बिना मानव मात्र में भेद करना अनिवर्चनीय और तर्कहीनता है।

उदाहरणार्थ मान लो यदि कोई व्यक्ति जन्म से अंधा है तब वह व्यक्ति यह कहे कि उसे ऐसा दण्ड क्यों मिला तब इसका तर्कसंगत उत्तर क्या होना चाहिए? यदि हम कहते हैं कि ये सब उसके पूर्वजन्मों के कर्मों का परिणाम है तब वह यह तर्क देगा कि उसने केवल वर्तमान जीवन को देखा है और इस प्रकार से जन्म लेते समय उसके कोई पूर्वकर्म ही नहीं है जो उसे इस जन्म में बुरा फल देते।

यदि हम कहते हैं कि यह भगवान की इच्छा थी तब यह भी अविश्वसनीय लगता है क्योंकि अकारण करुणा-करण भगवान जो सब पर बिना भेदभाव के करुणा करते हैं और वे कभी किसी को अनावश्यक रूप से अंधा नहीं बनाना चाहेंगे। इसकी तर्कसंगत व्याख्या यही है कि वह मनुष्य अपने पूर्वजन्म के कर्मों के कारणवश अंधा है। इस प्रकार सामान्य मत और धर्मग्रंथों के प्रमाणों के आधार पर हमें पूर्वजन्म की अवधारणा को स्वीकार करना चाहिए।

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